Mar 05 2024 / 8:52 AM

ध्यान : सब पूर्व-निर्धारित तो कोई भी काम क्यों?

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सारा वैश्विक आस्तिक-दर्शन कहता की, हमारे जीवन के सारे घटनाक्रम यानी सगे-संबंधी, खुशी-कष्ट-पीड़ा-मृत्यु सबकुछ पूर्व निर्धारित है. अगर हमसब किसी ऐसे नाटक के पात्र हैं जिसकी स्क्रिप्ट पहले ही लिखी जा चुकी है तो ध्यान हमें कैसे बदल सकेगा? कोई भी काम करने का क्या अर्थ? अगर उस नाटक में हमें निश्चित समय पर बदलने का अध्याय जुड़ा हो तो भी क्रिया की बात कुछ समझ आती है. लेकिन अगर ऐसा अध्याय उसमें जुड़ा ही है जो कि ठीक समय पर अपने को प्रकट करने का इंतजार कर रहा है तो भी हम ध्यान या कोई काम क्यों करें? किसी भी तरह का प्रयत्न क्यों करें?

ऐसे सवाल अक्सर पूछे जाते हैं. आपके अंदर भी ऐसी बातें जन्म लेती होंगी. आज हम इसी टॉपिक को समझते हैं.

मैं यह नहीं कह सकता कि सबकुछ नियत है। सृष्टि की व्याख्या के लिए मैं इसे एक सिद्धांत के रूप में नहीं पेश कर सकता हूँ। इसलिए कि वास्तव में यह एक उपाय है, सिद्धांत नहीं।

भारत सदा से भाग्य के इस उपाय को काम में लाता रहा है। इसका यह मतलब नहीं है कि सब कुछ पूर्व-नियत है। ऐसा कहने का एक ही कारण है कि अगर आप मानते हो कि सब कुछ निश्चित है तो सब कुछ स्वप्न हो जाता है। अगर चीजों को इस रूप में लो, अगर इस तरह मानो कि सब कुछ पूर्व-निश्चित है : उदाहरण के लिए कि आप शरीरी तौर पर एक निश्चित दिन मर जाओगे-तो सब कुछ स्‍वप्‍नवत हो जाता है। माया और नश्वर हो जाता है.

यह निश्चित नहीं है, यह तय नहीं है। कोई आप मे उतना उत्सुक भी नहीं-है। अस्तित्व को आपका पता भी नहीं है। उसे क्या पता कि आप कब मरोगे? यह बात ही इतनी व्यर्थ है।

अस्तित्व के लिए आपकी मृत्यु अप्रासंगिक है। अपने को इतना महत्वपूर्ण मत समझो कि सारी सृष्टि सबके मरने का दिन, समय, मिनट और क्षण तय करने में व्यस्त है। नहीं, आप केंद्र नहीं हो। सृष्टि को क्या फर्क पड़ता है कि आप हो या नहीं हो!

लेकिन यह भ्रांति मनुष्य के मन में बनी ही रहती है। तुम्हारे बचपन में ही यह भ्रांति जन्म लेती है और अचेतन का हिस्‍सा बन जाती है।

एक बच्चा पैदा होता है। वह संसार को कुछ दे तो नहीं सकता, पर उसे संसार से बहुत कुछ लेना होता है। वह बदले में कुछ भी नहीं दे सकता, कोई कीमत नहीं चुका सकता। वह इतना कमजोर है, असहाय है। लेकिन उसे भोजन चाहिए, उसे प्रेम चाहिए, उसे सुरक्षा चाहिए-उसे हर चीज चाहिए।

बच्चा जब पैदा होता है तो बिलकुल असहाय होता है-खासकर मनुष्य का बच्चा। कोई पशु इतना असहाय नहीं होता है। यही कारण है कि पशु का परिवार नहीं होता, उसकी जरूरत नहीं होती। लेकिन मनुष्य का शिशु इतना असहाय होता है कि वह मां-बाप के, कुटुंब के, समाज के सहारे के बिना जी ही नहीं सकता। वह अकेला नहीं जी सकता है, वह तुरंत मर जाएगा। वह इतना पर-निर्भर है।

तो उसे प्रेम चाहिए, उसे भोजन चाहिए, उसे सब कुछ चाहिए। वह सब की मांग करेगा। मां-बाप और पूरा परिवार उसकी मांगें पूरी करते रहते हैं। बच्चा तब सोचने लगता है कि मैं पूरे संसार का केंद्र हूं। उसे बस मांग करनी है और उसकी सब मांग पूरी होती है। बस मांगना काफी है-उसे कुछ और प्रयत्न नहीं करना है।

इस तरह बच्चा समझने लगता है कि वह केंद्र है और सब कुछ उसके लिए और उसके ही चारों तरफ गति करता है। उसे लगता है कि समूचा अस्तित्व उसके लिए बना है। मानो सब अस्तित्व उसके लिए ही इंतजाम कर रहा था कि आओ और मांगो, और सब मांगें पूरी की जाएंगी।

यह एक जरूरत है कि उसकी मांगें पूरी की जाएं, अन्यथा वह मर जाएगा। लेकिन यही जरूरत आगे चलकर खतरनाक सिद्ध होती है। बच्चा इस भाव के साथ बड़ा होता है कि मैं केंद्र हूं। धीरे-धीरे उसकी मांगें बढ़ती जाएंगी। बच्चे की मांगें तो मामूली थीं, वे पूरी की जा सकती थीं। लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा होगा, उसकी मागें जटिल होती जाएंगी। कभी-कभी उन्हें पूरी करना संभव नहीं होगा, कभी बिलकुल असंभव हो जाएगा। वह चांद या कुछ भी मांग सकता है।

जैसे-जैसे वह बड़ा होगा, उसकी मांगें जटिल और असंभव होती जाएंगी। तब निराशा शुरू होती है। बच्चा समझता है कि मैं ठगा जा रहा हूं। वह तो समझे बैठा था कि वह सारे संसार का केंद्र है। अब समस्याएं खड़ी होंगी, और वह धीरे-धीरे सिंहासन से उतार दिया जाएगा। वह अपदस्थ हो जाएगा, जब वह सयाना होगा तब बिलकुल अपदस्थ हो जाएगा। तब उसे पता चलेगा कि वह केंद्र नहीं है; लेकिन गहरे में उसका अचेतन माने ही जाएगा कि वह केंद्र है।

लोग पूछते हैं कि क्या हमारे भाग्य नियत हैं? वे असल में यह कह रहे हैं कि हम इस जगत के लिए इतने महत्वपूर्ण हैं कि हमारा भाग्य पहले से नियत होना ही चाहिए।

वे पूछते हैं, हमारा उद्देश्य क्या है? हम क्यों पैदा हुए? ये सारे प्रश्न बचपन की इसी मूढ़ता से पैदा हो रहे हैं कि हम जगत के केंद्र हैं। हम किसलिए बनाए गए?

आप किसी उद्देश्य के लिए नहीं बनाए गए हो। यह अच्छा है कि किसी उद्देश्य के लिए नहीं बने हो, अन्यथा एक यंत्र होते। यंत्र की रचना किसी उद्देश्य के लिए होती है।

मनुष्य किसी उद्देश्य के लिए नहीं बना है। नहीं, मनुष्य सृष्टि का प्रस्फुटन है, रचना की बाढ है। सब कुछ बस है, फूल है, नक्षत्र है, आप हो। सब कुछ सृजन का अतिरेक है, अस्तित्व का उत्सव है, आनंद है। कोई उद्देश्य नहीं है, लेकिन भाग्य का, पूर्व-नियति का यह सिद्धात समस्या पैदा करता है। यह इसीलिए कि हम इसे सिद्धात के रूप में लेते हैं। हम समझते हैं कि सब कुछ नियत है, लेकिन कुछ भी नियत नहीं है।

यह विधि भाग्य को एक उपाय के रूप में काम में लाती है। जब हम कहते हैं कि सब कुछ निश्चित है तो यह आपको किसी सिद्धात के रूप में नहीं कहा जाता है। इसका उद्देश्य यह है कि अगर जीवन को नाटक की तरह पूर्व-निश्चित समझते हो तो वह स्वप्न हो जाता है। उससे आशक्त नहीं होवोगे. आशक्ति सभी तरह के कुकर्म की जड़ है.

अगर मैं जानता हूं कि आज, आज रात, मैं आप से बोलने वाला हूं और यह पूर्व-निश्चित है कि कौन से शब्द मैं बोलूंगा और वह ऐसा निश्चित है कि उसमें अदल-बदल नहीं किया जा सकता तो अचानक मैं इस पूरी प्रक्रिया से असंबद्ध हो जाता हूं?

क्योंकि तब मैं कर्म का केंद्र नहीं रहा। अगर सब कुछ नियत है और अगर प्रत्येक शब्द अस्तित्व द्वारा या परमात्मा द्वारा या उसको जो भी नाम दो, बोला जाने वाला है तो मैं उसका स्रोत नहीं रहा, और तब मैं द्रष्टा बन सकता हूं, मात्र द्रष्टा।

इसलिए अगर आप जीवन को पूर्व-निश्चित मानो तो उसे देख सकते हो, तब उससे लिप्त नहीं हो। अगर सफल हुए तो वह नियति थी, अगर विफल हुए तो वह भी नियति थी। अगर सफलता और विफलता दोनों पूर्व -नियत हैं तो दोनों समान मूल्य के हो जाते हैं, दोनों समानार्थी हो जाते हैं।

तब कोई राम है कोई रावण है, और सब कुछ पूर्व-निश्चित है। रावण को अपराधी अनुभव करने की जरूरत नहीं है और न राम को अपने को श्रेष्ठ समझने की। सब पूर्व -निश्चित है, इसलिए आप मात्र अभिनेता हो। मंच पर किसी पात्र का अभिनय करते हो।

तो आपको यह भाव देने के लिए कि आप किसी का अभिनय करते हो, आपको यह प्रतीति देने के लिए कि किसी पूर्व -निश्चित भूमिका, को पूरा कर रहे हो, ताकि उसके पार जा सको. इस तरह से यह एक उपाय भर है।

इसे समझना कठिन है, क्योंकि हम भाग्य को एक सिद्धात के रूप में, उससे भी बढ़कर एक नियम के रूप में लेने के बड़े आदी हैं। हम ऐसी विधियों को उपाय के रूप में लेने की दृष्टि को नहीं समझ पाते हैं।

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